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रविवार, 4 अक्तूबर 2020

लड़ाई अन्याय से या हिन्दू राष्ट्र से? विरोध करने वाले बुद्धिजीवी ढपलीबाज गैंग… पहले तय कर लो, करना क्या है

हाथरस केस हिंदू राष्ट्र

यदि कोई आपसे सवाल करे कि बलात्कार और न्याय के बीच दूरी कितनी है? इस प्रश्न का उत्तर क्या होना चाहिए या यूँ कहे, “क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि इन दो शब्दों के बीच कितना फ़ासला है।” इसका एक ही जवाब है ‘हिन्दू राष्ट्र’ या ‘हिंदुत्व’! पहली बार में बेशक विचित्र लग सकता है पर यह सत्य है क्योंकि ‘न्याय’ की गुहार लगाने वालों की लड़ाई अन्याय के विरुद्ध शुरू होकर हिन्दू राष्ट्र और हिंदुत्व तक सीमित रह जाती है। विरोध करने वाली ‘संभ्रांत जनता’ अत्याचार को ख़त्म करते-करते हिन्दू राष्ट्र के खात्मे की ओर निकल लेती है। 

बड़े बुजुर्ग कह गए हैं संसार में हर रोग का उपचार उपलब्ध है लेकिन वैचारिक विकलांगता और दिग्भ्रमित हठधर्मिता का नहीं है। उत्तर प्रदेश के हाथरस की घटना को लेकर पूरे देश में आक्रोश है, सोशल मीडिया से लेकर सड़कों और चौराहों पर प्रदर्शनों की तस्वीर इस बात की तस्दीक करती हैं। विरोध होना भी चाहिए, अपराध हुआ तो विरोध भी होगा और न्याय भी। लेकिन सवाल जनता के उस हिस्से को लेकर है, जिनका एजेंडा ही कुछ और है। जो इंसाफ़ दिलाने के लिए सड़कों पर उतरते तो हैं लेकिन सदियों पुरानी वैचारिक कुंठा के फलीभूत अलग रास्ते पर निकल जाते हैं। सोशल मीडिया पर पिछले कई दिनों से कुछ तस्वीरें साझा की जा रही हैं। 

कुल मिला कर इस मिजाज़ की दो तस्वीरें हैं और दोनों का मजमून हुबहू है। तस्वीर में एक पोस्टरनुमा चीज़ नज़र आ रही है, जिस पर लिखा है “HINDURASHTRA IS A RAPIST” मायने हिन्दू राष्ट्र बलात्कारी है। एक दो व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा का पूरा राष्ट्र, हर नागरिक! मतलब बलात्कार सिर्फ एक ही धर्म में होते हैं अन्य मज़हब के लोग देवतुल्य हैं जन्नत से उतरे हुए, अन्य मज़हबों में बलात्कार होते ही नहीं। शायद होते होंगे लेकिन उस समय ऐसे क्रांतिकारी पोस्टर सामने नहीं आते हैं, जिसमें लिखा हो कि फलां (मज़हब) राष्ट्र इज़ ए रेपिस्ट या ढिमकां (रिलीजन) राष्ट्र इज़ ए रेपिस्ट (जनता स्वयं समझदार है)।

हिन्दू राष्ट्र को रेपिस्ट बताने वाले ढपलीबाज (साभार – सोशल मीडिया)

बात स्वयं में कितनी हास्यास्पद है कि इंसाफ़ की गुहार में हिन्दू शब्द इस कदर घुला हुआ है कि उसका धब्बा इन क्रांतिकारियों के कपड़ों से उतरता ही नहीं। इस पड़ाव पर लड़ाई/विरोध में न्याय शब्द का कद बौना हो जाता है और दोषी बन जाता है हिन्दू राष्ट्र। यहाँ अपराधी और अपराध शब्द मायने नहीं रखता बल्कि सारा दोष हिन्दू राष्ट्र का हो जाता है (वही हिन्दू राष्ट्र जिसमें रह कर तथाकथित क्रांतिकारी लोग प्रदर्शन कर रहे हैं)। ऐसे ही प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारियों का मूल स्वरूप सामने आता है। 

सोशल मीडिया पर जारी विरोध प्रदर्शन में एक और ऐसी ही तस्वीर सामने आई जिसमें लिखा था “I am a dalit not a hindu” अर्थात मैं एक दलित हूँ, हिन्दू नहीं। बेशक आप क्या हैं या कौन हैं, यह तय करने का अधिकार संविधान ने आपको दिया है। कुछ भी बन जाइए पर क्या यही समय है अपनी पहचान के प्रचार का? जो इच्छा है बने रहिए लेकिन जब समय मिले तो जनता को इस बात का जवाब भी ज़रूर दीजिए कि “मैं हिन्दू नहीं हूँ” इस अतिक्रांतिमय वक्तव्य से न्याय मिलने में कितनी मदद मिलेगी? सिद्ध क्या होगा यह बता कर?

गुड! लोकतंत्र है (साभार – सोशल मीडिया)

हिन्दू शब्द से स्वघोषित बुद्धिजीवी जमात का ‘लगाव’ नया बिलकुल नहीं है। हाल फ़िलहाल के कुछ साल उठा लीजिए, मुद्दा क़ानून व्यवस्था का हो या सामाजिक अव्यवस्था का, क्रांतिकारी महोदयों के अनुसार सारे फसाद की जड़ हिन्दू राष्ट्र और हिंदुत्व ही है।

सीएए और एनआरसी का विरोध में देश के अलग अलग क्षेत्रों में हुआ, इन प्रदर्शनों की तस्वीरें भी बकायदे चर्चा में रहीं। ऐसी ही एक तस्वीर थी, जिसमें एक युवती के गालों पर (जी हाँ सही पढ़ा आपने गालों पर) विशुद्ध हिन्दी में लिखा था ‘फ़क हिन्दू राष्ट्र’। लोकतंत्र है और लोकतंत्र में ढपली पीट कर आलोचनात्मक कीर्तन करने का अधिकार सभी के पास है। फिर भी ठंडे दिमाग से सोचिए मुद्दा देश पर लागू किए गए एक क़ानून से जुड़ा हुआ है और स्वघोषित क्रांतिकारी हिन्दू राष्ट्र ‘फ़क’ करने निकले हैं। 

क्या किसी और मज़हब को भी इस तरह फ़क किया जा सकता है? (साभार – सोशल मीडिया)

ऐसी ही एक और तस्वीर है। हालाँकि यह पुरानी है लेकिन इसके मूल में भी वही संदेश है। यहाँ लिखा है महिलाएँ हिन्दू राष्ट्र को डिस्ट्रॉय करेंगी (कारण भी बताते चलिए)। क्या इस धर्म को नष्ट करना आसान है? सदियों से इस श्रेणी के प्रयास हो रहे हैं, 1-2 हथौड़ा आप भी चला कर देख लीजिए और हो जाए तो अवश्य सूचित करिए।

लेकिन कैसे? (साभार – सोशल मीडिया)

एक तस्वीर में इस वैचारिक निर्लज्जता की सीमा ही पार कर दी गई थी। हिटलर की नाज़ी सेना के चिन्ह को स्वास्तिक के रूप में दिखा कर हिंदुत्व के लिए अपशब्द लिखे गए थे। 

ढपलीबाज स्वास्तिक और नाज़ी के चिन्ह की खिचड़ी बनाते हुए (साभार – सोशल मीडिया)

बाकी देश के दो तथाकथित उदारवादी और बुद्दिजीवियों के गढ़ जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लगाए गए नारे सदाबहार हैं ही। उन नारों में खपाई गई ऊर्जा और झोंके गए मंतव्य से साफ़ हो जाता है कि व्यक्ति के जीवन में केवल शिक्षा महत्वपूर्ण नहीं होती। बहुत कुछ अहम होता है जिसकी इन लोगों के पास भीषण कमी है।

इस ग्रह का कोई भी अन्य मज़हब (सॉरी धर्म) उठा लीजिए और उसके बारे में चंद व्यंग्यात्मक टिप्पणी करके देखिए। पलक झपकते ही नज़ारे बदल जाएँगे, संदेह हो तो लिखिए एक बार ‘फ़क फला मज़हब’। फिर इस मुल्क में रहने वाले बुद्धिजीवी कहते हैं कि हिन्दू शब्द के इर्द गिर्द गढ़ी गई सारी परिभाषाएँ असहिष्णु हैं।

यह बात ऊपर कई बार लिखी जा चुकी है एक बार फिर से पढ़ लीजिए, क्या बलात्कार हिन्दू राष्ट्र में ही होते हैं? क्या पूरा हिन्दू राष्ट्र बलात्कारी है, हर नागरिक? क्या दूसरे समुदायों में बलात्कार नहीं होते हैं? होते हैं तो क्या उनके लिए भी आपका विरोध इतना ही स्पष्ट और खरा होगा? ऐसे विरोध की सूरत वाली लड़ाइयों का नतीजा क्या होगा यह तो नहीं पता लेकिन यह भटकी हुई ज़रूर हैं। तय इन्हें ही करना है कि न्याय के लिए लड़ना है या हिन्दू राष्ट्र से?   


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