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रविवार, 11 अक्तूबर 2020

सिंहासन खाली हुई लेकिन जनता नहीं, सत्तालोलुप नेता आए: जेपी के वो चेले, जिन्होंने उड़ा दी गुरु की ही ‘धज्जियाँ’

जेपी, जयप्रकाश नारायण


एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।
एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है।

इस कविता में ‘गुड़िया’ किसे कहा गया है और कौन वो ‘बूढ़ा आदमी’ है, ये आपको समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। जब आपको बताया जाए कि दुष्यंत ने ये कविता आपातकाल के आसपास लिखी थी, तब तो आप समझ ही जाएँगे। जब पूरे देश में लोकतंत्र का हनन हो रहा था, तब जयप्रकाश नारायण भारत की सबसे बड़ी उम्मीद बन कर सामने आए और ये भी जानने लायक है कि आज हम यूपी-बिहार में जिन नेताओं को राजनीति का धुरंधर मानते हैं, वो जेपी आंदोलन की ही उपज हैं।

जेपी की हस्ती का अंदाज़ा इसी से लगा लीजिए कि आज दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी का मुखिया उनके ही छात्र आंदोलन की सीढ़ियाँ चढ़ कर निकला है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा बिहार आंदोलन का हिस्सा रहे हैं। आपातकाल के समय हर सक्रिय युवा नेता को कभी न कभी जेपी से प्रेरणा मिली, आशीर्वाद मिला। लेकिन, बिहार एक ऐसा राज्य है, जहाँ जेपी के चेलों ने जनता को सबसे ज्यादा निराश किया।

जयप्रकाश नारायण के सहारे उपजे बिहार में कई नेता

यूपी-बिहार ही नहीं, लगभग पूरे देश में कई ऐसे बड़े नेता हैं, जो आज राजनीति के इस मुकाम पर इसीलिए हैं क्योंकि उन पर कभी न कभी जेपी का हाथ था। दिवंगत अरुण जेटली हों या बिहार में लालू यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, सुशील कुमार मोदी और रविशंकर प्रसाद से लेकर यूपी के मुलायम सिंह यादव, या फिर दिल्ली और गुजरात के कई नेता – जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से निकले चेहरे सत्ता में छाए रहे।

लेकिन, यहाँ सबसे बड़ा सवाल है कि क्या जेपी के चेलों ने उसी रास्ते को अपनाया, जो वो चाहते थे? कहीं से भी ऐसा नहीं लगता। ऐसा इसीलिए, क्योंकि बिहार में जेपी आंदोलन से जो 3 प्रमुख चेहरे निकल कर सामने आए, उन तीनों ने ही सत्ता से चिपके रहने में कोई कसर नहीं छोड़ी। साथ ही जेपी आंदोलन के सेनानियों को पेंशन देने के अलावा उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया, जिसके लिए उतना बड़ा आंदोलन हुआ था।

आपको एक छोटा सा वाकया सुनाते हैं। लालू यादव हाल के दिनों में एक चुनाव के दौरान एक बड़े चैनल पर इंटरव्यू के लिए बैठे हुए थे। वहाँ एक वरिष्ठ पत्रकार ने उनसे पूछ दिया कि जेपी आंदोलन से देश को, या बिहार को, क्या फायदा हुआ? लालू यादव ने जवाब दिया कि हम लोग नेता बन गए, हो गया आंदोलन का उद्देश्य पूरा। पत्रकार ने पलट कर पूछा ज़रूर कि आपको नेता बनाने के लिए जेपी आंदोलन थोड़ी हुआ था, लेकिन लालू ने चिर-परिचित अंदाज़ में हँस-बोल कर सवाल को घुमा दिया।

लालू यादव ने खुल कर कह दिया, लेकिन जेपी आंदोलन से निकले नेताओं के पास एक यही जवाब है – “हम नेता बन गए।” शायद इन नेताओं का उद्देश्य ही था कि इन्हें ‘नेता’ बनना है। ये चीजें इनके मन में तब भी थीं, जब ये अपने छात्र जीवन में जेपी के छत्र तले कुलाँचे भर रहे थे। जैसा कि हम जानते हैं, लालू यादव 1973 में पटना विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए थे। तब नीतीश और सुशील उनके मातहत हुआ करते थे।

उन्हीं छात्र नेताओं में नरेंद्र सिंह भी थे, जिनके हवाले से संतोष कुमार ने अपनी पुस्तक ‘बंधू बिहार’ में लिखा है कि एक बार मोरारजी देसाई पटना आए थे तो उनका इंट्रो देने के लिए मंच पर गए लालू यादव ने खुद ही लंबा-चौड़ा भाषण दे दिया और गायब हो गए। बाद में उन्होंने बताया कि मोरारजी देसाई के बोलने के बाद उन्हें कौन सुनता, इसीलिए उन्होंने ऐसा किया। युवाओं में महत्वाकांक्षा अच्छी बात है, लेकिन यही महत्वाकांक्षा जब लालच और अतिआत्मविश्वास में बदल जाए तो चीजें गड़बड़ होने लगती हैं।

लालू यादव: छात्र राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा, राजनीति का सबसे बड़ा ‘Let-down’

छात्र राजनीति के दिनों में जिस तरह से लालू यादव ने अपनी छवि बनाई थी और अपने हलके-फुल्के अंदाज़ से बड़े नेताओं से लेकर जनता तक का दिल जीता था, उन्हीं लालू यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में जनता को इतना निराश किया कि उनके 15 वर्ष के कार्यकाल (राबड़ी यादव का भी) को जंगलराज की संज्ञा दी गई। जेपी आंदोलन के सबसे बड़े सिपाहियों में से एक लालू यादव आज चारा घोटाला मामले में जेल में बंद हैं।

लालू यादव ने जय प्रकाश नारायण के आशीर्वाद से बने जनता दल से इसीलिए नाता तोड़ लिया, ताकि वो सत्ता पर आसीन रहें। राष्ट्रीय जनता दल का गठन हुआ और इस पार्टी ने उसी कॉन्ग्रेस से हाथ मिलाया, जिसका विरोध कर-कर के लालू यादव नेता बने थे। बिहार विधानसभा के बाहर कई दिनों तक छात्रों का धरना-प्रदर्शन चला था, उन्होंने लाठियाँ खाईं, गिरफ्तारियाँ दीं – लालू ने इन सबके लिए जिम्मेदार पार्टी से ही हाथ मिला लिया।

कॉन्ग्रेस के जिस तानाशाही ‘मीसा एक्ट’ का विरोध करने के लिए उन्होंने अपनी बेटी का नाम मीसा भारती रखा था, वही मीसा भारती बाद में राजद-कॉन्ग्रेस गठबंधन की तरफ से राज्यसभा पहुँची। लालू यादव ने हमेशा ‘फैमिली फर्स्ट’ का फॉर्मूला अपनाया और उसी सिद्धांत को चकनाचूर करते रहे, जिसका जेपी ने ज़िंदगी भर पालन किया। जयप्रकाश नारायण ने ज़िंदगी भर वंशवादी कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार का विरोध ही किया।

कभी लालू यादव जयप्रकाश नारायण के पाँव पड़ गए थे और उन्हें बिहार के छात्रों का नेतृत्व करने को कहा था, लेकिन जब अपने से आगे की पीढ़ी को बागडोर देने की बात सामने आई तो उन्होंने अपने बेटे तेजस्वी यादव को उप-मुख्यमंत्री और तेज प्रताप यादव को मंत्री बनाया। राजद में पप्पू यादव से लेकर सम्राट चौधरी तक, जो भी आगे पंक्ति का नेता उभरा या जिसने भी पार्टी में लोकतंत्र की बात की – उसे निकाल बाहर किया गया।

बिहार में 15 वर्षों तक खून बहता रहा और सरकार भी बाहुबलियों को पालती रही। हत्याएँ, बलात्कार, अपहरण और रंगदारी के सिवा इन 15 वर्षों में बिहार ने कुछ नहीं देखा। सरकार चलाने के नाम पर घोटाले होते रहे और चुनाव के दौरान ‘मतपेटियों से जिन्न’ निकलता रहा। इन सबके बीच जयप्रकाश नारायण, उनकी ‘सम्पूर्ण क्रांति’ और उनके सिद्धांत कहीं खो गए। लालू आज भी नहीं बदले हैं। उनकी अनुपस्थिति में बेटे पार्टी चला रहे हैं।

नीतीश कुमार और सुशील मोदी: उम्मीदें जगाई भी, फिर मिटाई भी

लालू यादव की तरह ही नीतीश कुमार भी उसी कद के नेता बन कर उभरे। हाँ, इसमें उन्हें जरा देर ज़रूर हुई। जेपी आंदोलन के दौरान के अपने साथी लालू यादव के जंगलराज के छुटकारे से जनता को सबसे बड़ी उम्मीद उन्हीं से थी। 2005 में वो मुख्यमंत्री बने और उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के साथ मिल कर सरकार चलाई भी। पहले कार्यकाल के दौरान सब ठीक रहा और जनता को लगने लगा था कि बिहार अब प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

सड़कें बननी शुरू हुईं, बिजली का काम तेज़ हुआ और सबसे बढ़कर अपराध पर लगाम लगा। लेकिन 2010 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद सब कुछ बदल गया और देश में राजनीतिक शून्य को देखते हुए कई नेताओं की तरह नीतीश कुमार का भी प्रधानमंत्री बनने का सपना हिलोरे मारने लगा। भाजपा से गठबंधन टूटा, वो अपने धुर-विरोधी लालू यादव से जा मिले और जिस परिवार को जनता ने राजनीतिक रूप से दफन कर दिया था, वो अचानक से सक्रिय हो उठा।

नीतीश कुमार ने फिर लालू यादव का साथ छोड़ा और भाजपा के साथ मिल कर सरकार बना ली। अब वो फिर से भाजपा के साथ गठबंधन में चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। इस बीच उन्होंने भाजपा से गठबंधन टूटने और लालू के साथ चुनाव लड़ने के बीच जीतन राम माँझी को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उनका ये स्टंट भी फेल रहा। सत्ता में बने रहने के लिए इतने यू-टर्न लिए उन्होंने कि ‘गुड गवर्नेंस’ या सुशासन कब का पीछे छूट गया।

सरकार में दो नंबर के नेता सुशील कुमार मोदी छात्र जीवन से ही संगठन में दो नंबर की ही भूमिका में रहे और उन्होंने भी हमेशा सत्ता को ही चुना। पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ में लालू यादव के अध्यक्षीय कार्यकाल में महासचिव रहने से लेकर नीतीश-भाजपा गठबंधन के निर्विरोध उप-मुख्यमंत्री तक, उन्होंने सत्ता में बने रहने को ही अंतिम नियति मान लिया और कभी नीतीश के कुशासन को लेकर मुँह नहीं खोला।

पटना में 2019 में आए जलजमाव के दौरान जनता ने देखा कि कैसे बिहार के उप-मुख्यमंत्री को ही परिवार सहित रेस्क्यू करना पड़ा। आजकल उनकी ज़िंदगी इन तीन कार्यों पर टिकी हैं – ट्विटर पर बयान देना, उस बयान का अखबार में छपना और फिर अख़बार की उस कटिंग का फिर ट्वीट बनना। चारा घोटाला मामले में खुलासा करने और विरोध में सबसे आगे रहे सुशील मोदी का काम अब यही बचा है कि रोज जनता को लालू के जंगलराज की याद दिलाओ।

जेपी के बड़े सेनानियों से जनता को मिली सिर्फ निराशा

जयप्रकाश नारायण को जनता पार्टी को अपने सिद्धांतों से भटक कर दूर जाते हुए देखने के लिए अपने निधन का इन्तजार नहीं करना पड़ा। ये सब उनके जीवनकाल में ही शुरू हो गया था। जिस तरह महात्मा गाँधी चाहते थे कि कॉन्ग्रेस भंग कर दिया जाए लेकिन आज़ादी के बाद कोई उनका सुनने वाला तक न था, वही हाल जेपी का भी हो गया था। उनके अंतिम दिनों में तो कई लोग उन्हें पहचान तक नहीं पाते थे।

इसी तरह मुलायम सिंह यादव ने भी उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सत्ता को कुछ इस तरह भोगा कि उनके परिवार के 50 से अधिक सदस्य पंचायत से लेकर मुख्यमंत्री तक कई बड़े पदों पर रहे। मुलायम सिंह यादव के घर की तस्वीर जब आती है, तो अमेरिका का वाइट हाउस भी उसके सामने फीका लगता है। ‘समाजवाद’ के नाम पर रामभक्तों पर गोलियाँ चलवाने और मुस्लिम तुष्टिकरण के अलावा शायद ही कुछ उनकी उपलब्धि हो।

दिवंगत रामविलास पासवान जेपी आंदोलन से पहले ही नेता बन चुके थे और वो जब विधायक बने थे, तब लालू-नीतीश छात्र ही थे। रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान 2 बार समस्तीपुर के सांसद रहे। उनके एक भाई पशुपति कुमार पारस फ़िलहाल सांसद हैं और खगड़िया के अलौली से 7 बार विधायक रह चुके हैं। उनके बेटे पार्टी संभाल रहे हैं। भतीजा सांसद है। वो भी ज़िंदगी भर ‘दलित नेता’ का टैग लिए जीते रहे।

जिस परिवारवाद के शासन के खिलाफ जयप्रकाश नारायण ने लड़ाई का बीड़ा उठाया था और जिनके नेतृत्व में राष्ट्रकवि ने ‘सिंहासन खाली करो’ का नारा दिया था, आज उनके सिद्धांतों को उनके ही चेले चूर-चूर कर रहे हैं। दक्षिण में जाएँ तो एचडी देवेगौड़ा पीएम रहे, उनके बेटे सीएम रहे। अब जनता दल नाममात्र का बचा है और जेपी के विचार भी। जमीन पर लड़ने वाले जेपी सेनानियों को चंद रुपए का पेंशन मिला, बस!


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