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गुरुवार, 1 अक्तूबर 2020

लॉकडाउन, मास्क, एंटीजन टेस्ट… कोरोना को रोकने के लिए भारत ने समय पर लिए फैसले, दुनिया ने किया अनुकरण

कोरोना वायरस

भारत में कोरोना संक्रमण के मामले अब धीरे-धीरे 63 लाख का आँकड़ा पार कर चुके हैं। पिछले 24 घंटों की यदि बात करें तो पॉजिटिव केसों की संख्या 86 हजार से अधिक आई है। इसी के साथ भारत हर दिन सबसे अधिक नए कोरोना केस और मौतें रिकॉर्ड करने वाला देश बन गया है।

ऐसे में कई लोगों को लगता है कि भारत ने कोरोना संक्रमण को रोकने के नाम पर अपनी प्रतिक्रिया का केवल प्रचार ही किया है और उचित कदम नहीं उठाए हैं। इन दावों की पड़ताल करते हुए ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के सीनियर फेलो और हेल्थ इनिशिएटिव के हेड ओसी कुरियन ने इस पर अपनी बात रखी है। उन्होंने ट्वीट थ्रेड में एंटीजन, मास्क और लॉकडाउन सब पर चर्चा की है।

वह लॉकडाउन से बात शुरू करते हैं और बताते हैं कि लॉकडाउन को एक आपदा कहना फैशन हो गया है, जबकि लॉकडाउन का मकसद कोरोना के प्रसार पर रोक लगाना था। साथ ही लॉकडाउन से हेल्थ सिस्टम को अच्छे से तैयारी करने का मौका भी मिला।

आगे वह कहते हैं कि यह बहस हो सकती कि लॉकडाउन को कैसे लंबे समय तक के लिए लागू किया गया था। लेकिन उसी दौरान, ये ध्यान में रखना होगा कि लॉकडाउन एकमात्र साधन था जिससे हम महामारी से होने वाले नुकसान को कम कर सकते थे और इससे निपटने के लिए थोड़ा समय ले सकते थे। आज मृत्यु दर के आँकड़े देखकर हम इस बात की शिकायत नहीं कर सकते कि इससे संक्रमण पर फर्क नहीं पड़ा।

इसके बाद वह भारत के उन निर्णय पर गौर करवाते हुए कहते हैं कि जब सरकार ने रैपिड एंटीजन टेस्ट को बढ़ावा दिया था, तब भारतीय विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया था। मगर अब WHO ही रैपिड टेस्ट का विज्ञापन पूरी दुनिया में कर रहा है। ध्यान रखने वाली बात हैं कि भारत ने रैपिड टेस्टिंग का फैसला लॉकडाउन रहते ही ले लिया था।

आगे वह बताते हैं कि जून तक भी WHO इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं था कि जनता को मास्क पहनने से फायदा होगा या नहीं। मगर, 130 करोड़ जनसंख्या वाले भारत में बड़े भागों में इसे अप्रैल से पहले ही कंपल्सरी कर दिया गया। अमेरिका में मास्क अनिवार्य 5 जुलाई किया गया था।

वह लिखते हैं कि भारत एक जटिल देश हैं और निश्चित रूप से उसके लिए महामारी से निपटना बड़ी चुनौती है। प्रणालीगत कमजोरियों को देखते हुए, भारत के राज्य और केंद्र, संक्रमण की बढ़ती संख्या के बावजूद मृत्यु दर को कम रखने और उसमें गिरावट को लेकर, एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य को कर रहे हैं। हम विफल नहीं हुए हैं।


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